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यूरिक एसिड क्यों बढ़ता है? आयुर्वेद की नज़र से जानिए असली कारण, शुरुआती संकेत और बचाव

Rishi K Sharma
July 16, 2026
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यूरिक एसिड क्यों बढ़ता है? आयुर्वेद की नज़र से जानिए असली कारण, शुरुआती संकेत और बचाव

यूरिक एसिड क्यों बढ़ता है? आयुर्वेद की नज़र से समझिए शरीर के संकेत, असली कारण और स्वस्थ जीवन की शुरुआत

आज यूरिक एसिड सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली का संकेत है

कुछ साल पहले तक यूरिक एसिड बढ़ने की समस्या को मुख्यतः बुज़ुर्गों की बीमारी माना जाता था। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। 30–40 वर्ष की आयु के लोग ही नहीं, बल्कि कई युवा भी जोड़ों में दर्द, सुबह उठने पर अकड़न, पैरों के अंगूठे में सूजन और बार-बार थकान जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। जब जाँच कराई जाती है, तब पता चलता है कि यूरिक एसिड सामान्य सीमा से अधिक है।

दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश लोग अपनी रिपोर्ट देखकर केवल दवा शुरू करने पर ध्यान देते हैं, लेकिन यह समझने की कोशिश नहीं करते कि आखिर शरीर में ऐसा क्या बदल गया जिससे यूरिक एसिड बढ़ने लगा।

यहीं से आयुर्वेद की सोच आधुनिक चिकित्सा से थोड़ी अलग दिखाई देती है। आयुर्वेद केवल किसी एक बढ़े हुए मान (Value) को नहीं देखता, बल्कि यह समझने का प्रयास करता है कि शरीर का संतुलन कहाँ बिगड़ा है। क्योंकि जब तक मूल कारण नहीं सुधरता, तब तक केवल रिपोर्ट सामान्य हो जाना लंबे समय तक स्वास्थ्य की गारंटी नहीं बनता।


यूरिक एसिड आखिर होता क्या है?

सरल शब्दों में समझें तो यूरिक एसिड शरीर में बनने वाला एक प्राकृतिक अपशिष्ट पदार्थ (Waste Product) है। जब शरीर प्यूरीन (Purine) नामक तत्व को तोड़ता है, तब यूरिक एसिड बनता है। प्यूरीन हमारे शरीर में भी बनता है और भोजन से भी प्राप्त होता है।

सामान्य स्थिति में किडनी अतिरिक्त यूरिक एसिड को मूत्र के माध्यम से बाहर निकाल देती है। लेकिन जब इसका निर्माण अधिक होने लगे या किडनी उसे पर्याप्त मात्रा में बाहर न निकाल पाए, तब यह रक्त में बढ़ने लगता है। धीरे-धीरे इसके छोटे-छोटे क्रिस्टल बनकर जोड़ों, ऊतकों और कभी-कभी किडनी में भी जमा होने लगते हैं।

यहीं से दर्द, सूजन, अकड़न और आगे चलकर गाउट (Gout) जैसी समस्याएँ विकसित हो सकती हैं।

लेकिन क्या कहानी यहीं समाप्त हो जाती है?

आयुर्वेद कहता है—नहीं।


आयुर्वेद की नज़र में समस्या यूरिक एसिड नहीं, शरीर का असंतुलन है

आयुर्वेद में "यूरिक एसिड" शब्द का उल्लेख नहीं मिलता, क्योंकि उस समय लैब टेस्ट नहीं थे। फिर भी यदि इसके लक्षणों और कारणों को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या मुख्यतः मंदाग्नि (कमज़ोर पाचन शक्ति), आम (अधपचे विषैले तत्व) और बढ़े हुए वात दोष से जुड़ी हो सकती है।

आयुर्वेद कहता है कि स्वस्थ शरीर की सबसे बड़ी पहचान है—संतुलित अग्नि।

यहाँ अग्नि का अर्थ केवल पेट की आग नहीं है, बल्कि वह शक्ति है जो भोजन को ऊर्जा, रक्त, मांस, अस्थि और शरीर की अन्य धातुओं में बदलती है।

जब यही अग्नि कमजोर पड़ जाती है, तब भोजन पूरी तरह नहीं पचता। धीरे-धीरे अधपचा अंश शरीर में "आम" के रूप में जमा होने लगता है।

इसे ऐसे समझिए...

यदि घर की रसोई का सिंक रोज़ साफ़ न किया जाए, तो शुरुआत में पानी धीरे-धीरे निकलता है। कुछ दिनों बाद पाइप में गंदगी जमा होने लगती है और अंततः पानी रुक जाता है।

शरीर भी कुछ ऐसा ही काम करता है।

जब वर्षों तक अनियमित भोजन, देर रात खाना, कम पानी पीना, तनाव, अधिक तला-भुना भोजन और शारीरिक निष्क्रियता बनी रहती है, तब शरीर के भीतर भी अपशिष्ट पदार्थ जमा होने लगते हैं। आयुर्वेद इन्हीं को "आम" कहता है।

जब यही आम वात दोष के साथ मिल जाता है, तो वह उन स्थानों पर जाकर रुक सकता है जहाँ शरीर अपेक्षाकृत कमजोर होता है—विशेषकर जोड़ों में। परिणामस्वरूप दर्द, सूजन, भारीपन और चलने-फिरने में असुविधा जैसी समस्याएँ दिखाई देने लगती हैं।


क्या हर बढ़ा हुआ यूरिक एसिड दर्द देता है?

यह एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

कई लोगों की रिपोर्ट में यूरिक एसिड सामान्य सीमा से ऊपर होता है, लेकिन उन्हें कोई तकलीफ़ महसूस नहीं होती। वहीं कुछ लोगों में थोड़ा-सा बढ़ा हुआ स्तर भी जोड़ों में तेज़ दर्द पैदा कर सकता है।

इसका कारण केवल रिपोर्ट नहीं, बल्कि शरीर की समग्र स्थिति भी होती है।

यदि शरीर में पहले से सूजन, मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, किडनी संबंधी समस्या या लगातार गलत खानपान की आदतें मौजूद हैं, तो यूरिक एसिड का प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है।

यही कारण है कि डॉक्टर केवल रिपोर्ट नहीं देखते, बल्कि व्यक्ति के लक्षण, जीवनशैली और अन्य बीमारियों को भी ध्यान में रखते हैं।


हमारी रसोई भी कई बार समस्या की शुरुआत बन जाती है

जब भी यूरिक एसिड की बात होती है, अधिकांश लोग सबसे पहले दाल, पालक या टमाटर को दोष देने लगते हैं। जबकि सच्चाई इससे कहीं अधिक व्यापक है।

समस्या केवल किसी एक भोजन की नहीं, बल्कि पूरी खाने की आदत की होती है।

सुबह नाश्ता छोड़ देना...दोपहर में बहुत अधिक खाना...दिनभर पानी कम पीना...रात को 11–12 बजे भारी भोजन करना...हर सप्ताह कई बार बाहर का तला-भुना खाना...

मीठे पेय, कोल्ड ड्रिंक और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का नियमित सेवन...

ये आदतें धीरे-धीरे शरीर के चयापचय (Metabolism) पर प्रभाव डालती हैं।

आयुर्वेद में कहा गया है कि गलत भोजन से अधिक नुकसान गलत भोजन करने का तरीका करता है।

अर्थात केवल क्या खाया, यह महत्वपूर्ण नहीं है; कब खाया, कितना खाया और कैसे पचाया, यह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

इसीलिए आयुर्वेद भोजन को दवा का पहला रूप मानता है।


शरीर पहले ही संकेत देता है, बस हम उन्हें पहचान नहीं पाते

अक्सर लोग सोचते हैं कि यूरिक एसिड बढ़ने का मतलब केवल जोड़ों में तेज़ दर्द होना है। जबकि वास्तविकता यह है कि शरीर कई बार महीनों पहले छोटे-छोटे संकेत देना शुरू कर देता है। यदि इन्हें समय रहते समझ लिया जाए, तो जीवनशैली में बदलाव करके समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है।

uric acid warning signs

1. सुबह उठते समय जोड़ों में अकड़न

यदि सुबह बिस्तर से उठते समय घुटनों, टखनों, पैरों के अंगूठे या हाथों की उंगलियों में कुछ मिनटों तक जकड़न महसूस होती है, तो इसे केवल बढ़ती उम्र का असर मानकर न टालें।

रातभर शरीर आराम की अवस्था में रहता है। यदि शरीर में सूजन की प्रक्रिया चल रही हो या जोड़ों के आसपास परिवर्तन होने लगे हों, तो सुबह के समय यह अकड़न अधिक महसूस हो सकती है। कुछ देर चलने-फिरने के बाद आराम मिलना भी एक सामान्य अनुभव हो सकता है।

2. पैरों के अंगूठे में अचानक दर्द

यूरिक एसिड से जुड़ी सबसे चर्चित समस्या गाउट (Gout) है, जिसकी शुरुआत अक्सर पैर के अंगूठे के जोड़ से होती है। कई लोगों को रात में अचानक तेज़ दर्द, लालिमा या सूजन महसूस होती है।

हालांकि हर व्यक्ति में यही लक्षण हों, ऐसा आवश्यक नहीं है। कुछ लोगों में शुरुआत घुटनों, टखनों या उंगलियों के जोड़ों से भी हो सकती है।

3. शरीर जल्दी थकने लगना

यदि पर्याप्त नींद लेने के बाद भी शरीर भारी महसूस हो, ऊर्जा कम लगे या पूरे दिन सुस्ती बनी रहे, तो केवल विटामिन की कमी ही कारण नहीं होती। अनियमित भोजन, मोटापा, कम शारीरिक गतिविधि और चयापचय संबंधी समस्याएँ भी इसका हिस्सा हो सकती हैं।

आयुर्वेद इसे अक्सर मंदाग्नि और आम से जोड़कर देखता है। जब भोजन ठीक प्रकार से नहीं पचता, तो शरीर को अपेक्षित ऊर्जा भी नहीं मिल पाती।

4. बार-बार सूजन महसूस होना

कभी जूते अचानक तंग लगने लगें, टखनों के आसपास सूजन दिखे या किसी जोड़ में हल्की गर्माहट महसूस हो, तो यह भी ध्यान देने योग्य संकेत हो सकता है।

5. बार-बार पथरी बनने की समस्या

हर किडनी स्टोन यूरिक एसिड के कारण नहीं बनता, लेकिन कुछ लोगों में लंबे समय तक बढ़ा हुआ यूरिक एसिड जोखिम बढ़ा सकता है। यदि बार-बार पथरी की समस्या हो रही है, तो चिकित्सक की सलाह से उचित जाँच करवाना आवश्यक है।


क्या केवल दवा से यूरिक एसिड नियंत्रित हो जाएगा?

यह प्रश्न लगभग हर मरीज पूछता है।

दवा कई परिस्थितियों में आवश्यक हो सकती है, विशेषकर जब यूरिक एसिड का स्तर अधिक हो, गाउट के अटैक बार-बार आते हों या किडनी प्रभावित हो रही हो। लेकिन यदि दवा लेते हुए भी जीवनशैली पहले जैसी ही बनी रहे, तो समस्या दोबारा उभर सकती है।

यही कारण है कि डॉक्टर और आयुर्वेदाचार्य दोनों ही आहार और दिनचर्या पर विशेष ध्यान देने की सलाह देते हैं।


रसोई से ही शुरू होती है सुधार की पहली सीढ़ी

भारतीय रसोई में ऐसे अनेक पारंपरिक तरीके हैं, जिनका उद्देश्य केवल स्वाद बढ़ाना नहीं बल्कि भोजन को पचाने योग्य बनाना भी था। आज तेज़ जीवनशैली में इन आदतों का महत्व कम होता जा रहा है।

दालों को भिगोकर पकाने की आदत

दालों को 6 से 8 घंटे तक भिगोकर पकाना भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है। इससे दाल जल्दी पकती है और कई लोगों को पाचन में भी आसानी महसूस होती है। कुछ शोध यह भी बताते हैं कि भिगोने से कुछ प्राकृतिक यौगिकों (जैसे फाइटेट्स) की मात्रा कम हो सकती है, जिससे पोषक तत्वों की उपलब्धता बेहतर हो सकती है।

यदि आपको गैस, अपच या भारीपन की समस्या रहती है, तो दालों को भिगोकर बनाना एक अच्छी आदत हो सकती है।

पहली उबाल का झाग क्यों हटाया जाता है?

हमारे घरों में अक्सर दाल उबालते समय ऊपर आने वाले झाग को हटाने की परंपरा रही है। इसे लेकर अलग-अलग मान्यताएँ हैं।

कुछ लोग मानते हैं कि इससे दाल साफ़ होती है, जबकि कुछ इसे केवल झाग के रूप में देखते हैं। वैज्ञानिक रूप से यह कहना सही नहीं होगा कि इससे यूरिक एसिड कम हो जाता है, लेकिन कई पारंपरिक रसोइयों का अनुभव है कि इससे दाल हल्की महसूस होती है और कुछ लोगों को पाचन में आराम मिलता है।

इसीलिए यदि आप यह तरीका अपनाते हैं, तो इसे पाचन सुधारने वाली पारंपरिक रसोई आदत के रूप में देखें, न कि किसी चमत्कारी उपचार के रूप में।

दालों का चुनाव भी महत्वपूर्ण है

हर दाल हर व्यक्ति के लिए समान नहीं होती।

यदि बार-बार गैस, अपच या पेट फूलने की समस्या रहती है, तो एक साथ बहुत अधिक मात्रा में राजमा, छोले या साबुत उड़द खाने के बजाय इन्हें सीमित मात्रा में लें और अच्छी तरह पकाकर खाएँ।

दूसरी ओर, मूंग दाल को आयुर्वेद में अपेक्षाकृत सुपाच्य माना गया है। छिलका वाली मूंग भी संतुलित मात्रा में भोजन का अच्छा हिस्सा बन सकती है। मसूर और अरहर की दाल भी सामान्यतः संतुलित भोजन का हिस्सा हो सकती हैं, बशर्ते मात्रा और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति का ध्यान रखा जाए।


क्या बिल्कुल खाना छोड़ देना चाहिए?

कई लोग इंटरनेट पर पढ़कर दाल, पालक, टमाटर, दही या कई अन्य चीज़ें पूरी तरह बंद कर देते हैं।

यह तरीका सही नहीं है।

यदि किसी व्यक्ति का यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है, तो उसका पूरा आहार उसकी उम्र, वजन, किडनी की स्थिति, अन्य बीमारियों और डॉक्टर की सलाह के अनुसार तय होना चाहिए।

संतुलन हमेशा किसी भी अत्यधिक प्रतिबंध से बेहतर होता है।


क्या अधिक खाएँ?

यदि आपका उद्देश्य केवल यूरिक एसिड कम करना नहीं बल्कि पूरे शरीर का चयापचय बेहतर बनाना है, तो भोजन में इन बातों पर ध्यान दिया जा सकता है—

  • मौसमी हरी सब्जियाँ
  • लौकी, तोरई, परवल, कद्दू, खीरा जैसी हल्की सब्जियाँ
  • पर्याप्त सलाद (यदि पाचन ठीक रहता हो)
  • साबुत अनाज जैसे जौ, ओट्स या अन्य स्थानीय विकल्प
  • पर्याप्त मात्रा में पानी
  • ताज़े फल (व्यक्ति विशेष की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार)

आयुर्वेद भी ऋतु के अनुसार उपलब्ध ताज़े और सरल भोजन को प्राथमिकता देता है।


किन आदतों को धीरे-धीरे कम करना बेहतर होगा?

यूरिक एसिड की समस्या केवल एक भोजन से नहीं, बल्कि आदतों से जुड़ी होती है। इसलिए इन बातों पर विशेष ध्यान दें—

  • बार-बार मीठे पेय और कोल्ड ड्रिंक्स
  • अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड
  • देर रात भारी भोजन
  • दिनभर बहुत कम पानी पीना
  • लगातार बैठे रहना
  • बिना भूख के बार-बार स्नैकिंग करना

छोटे-छोटे बदलाव, जैसे समय पर भोजन करना, भोजन को अच्छी तरह चबाना और रात का खाना सोने से कम से कम 2–3 घंटे पहले लेना, लंबे समय में अधिक लाभकारी साबित हो सकते हैं।


याद रखें…

यूरिक एसिड का उपचार केवल रिपोर्ट सामान्य करने का नाम नहीं है। यदि आपकी दिनचर्या, भोजन की गुणवत्ता, नींद, तनाव और शारीरिक सक्रियता बेहतर होने लगती है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव केवल यूरिक एसिड पर ही नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य पर दिखाई देता है।

यही आयुर्वेद का मूल संदेश भी है—रोग को नहीं, रोग के कारणों को सुधारिए। जब जीवनशैली संतुलित होती है, तो शरीर स्वयं भी संतुलन की दिशा में काम करने लगता है। 

अगले भाग में मैं सुबह से रात तक की आयुर्वेदिक दिनचर्या, योग-प्राणायाम, पानी पीने का सही तरीका, वजन नियंत्रण, डॉक्टर  से कब मिलना चाहिए, इसके बारे में हम आपको विस्तार से बताएंगे। हमारे साथ जुड़े रहिए और अगला लेख पढ़िए।

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Frequently Asked Questions

यूरिक एसिड शरीर में बनने वाला एक प्राकृतिक अपशिष्ट पदार्थ है, जो प्यूरीन के टूटने पर बनता है। सामान्य स्थिति में किडनी इसे मूत्र के माध्यम से बाहर निकाल देती है।
अधिक प्यूरीन वाला भोजन, मोटापा, कम पानी पीना, किडनी की कमजोरी, शारीरिक निष्क्रियता और अनियमित जीवनशैली इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं।
नहीं। खानपान एक कारण है, लेकिन किडनी की कार्यक्षमता, वजन, तनाव, नींद की कमी और मेटाबॉलिक समस्याएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सुबह जोड़ों में अकड़न, पैरों के अंगूठे में दर्द, बार-बार थकान, सूजन और जोड़ों में भारीपन इसके शुरुआती संकेत हो सकते हैं।
नहीं। कई लोगों में यूरिक एसिड बढ़ा होने के बावजूद कोई लक्षण नहीं दिखाई देते, जबकि कुछ लोगों में हल्का बढ़ाव भी दर्द पैदा कर सकता है।
हां। लंबे समय तक उच्च यूरिक एसिड स्तर रहने पर जोड़ों में यूरिक एसिड क्रिस्टल जमा हो सकते हैं, जिससे गाउट की समस्या हो सकती है।
पर्याप्त पानी पीने से किडनी को यूरिक एसिड बाहर निकालने में मदद मिल सकती है, लेकिन यह अकेला उपचार नहीं है।
आयुर्वेद इसे मंदाग्नि, आम और वात दोष के असंतुलन से जुड़ी समस्या के रूप में देखता है।
दवा आवश्यक हो सकती है, लेकिन स्थायी सुधार के लिए आहार, दिनचर्या और जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी हैं।
कोल्ड ड्रिंक्स, प्रोसेस्ड फूड, देर रात भोजन, कम पानी पीना, शारीरिक निष्क्रियता और बार-बार स्नैकिंग जैसी आदतों से बचना चाहिए।
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Ayurveda & Lifestyle Educator | Founder, Dr. Mom Care

Rishi K. Sharma is an Ayurveda and Lifestyle Educator with over 15 years of experience in Ayurvedic herbs, formulations and lifestyle education. Through Dr.MomCare, he shares educational content on Ayurveda, nutrition, preventive health and healthy living.

His articles aim to make traditional Ayurvedic knowledge accessible to readers while encouraging informed health decisions based on reliable sources and qualified medical guidance.