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आज का इंसान इतना आक्रामक क्यों होता जा रहा है? मोबाइल, नशा और बदलती मानसिकता का सच

Rishi K Sharma
June 21, 2026
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आज का इंसान इतना आक्रामक क्यों होता जा रहा है? मोबाइल, नशा और बदलती मानसिकता का सच

आखिर आज का इंसान इतना आक्रामक क्यों होता जा रहा है? गलत खानपान, नशा, डोपामिन और खोती हुई मानसिक शांति

"हम पहले थकते शरीर से थे, आज थकते दिमाग से हैं।"

शायद हमारे दादा-दादी के समय में सुविधाएँ कम थीं, लेकिन नींद गहरी थी।

पैसे कम थे, लेकिन रिश्ते मजबूत थे।

तनाव था, लेकिन इंसान इतना अकेला नहीं था।

आज सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन मन की शांति घटती जा रही है।

अजीब बात यह है कि आज इंसान बाहर से फिट दिखाई देता है, लेकिन अंदर से टूटता जा रहा है।

डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी, गृहिणी, छात्र, बच्चे, बुजुर्ग—हर कोई किसी न किसी अदृश्य तनाव से गुजर रहा है।

और शायद इसीलिए छोटी-छोटी बातें अब बड़े विस्फोट में बदलने लगी हैं।

क्या हमारा भोजन भी हमारे स्वभाव को प्रभावित करता है?

हम अक्सर सोचते हैं कि खाना केवल शरीर के लिए होता है।

लेकिन आयुर्वेद हजारों साल पहले ही कह चुका है—

"जैसा अन्न, वैसा मन।"

आज हमारे भोजन में क्या बढ़ गया है?

  • जंक फूड

  • प्रोसेस्ड फूड

  • अत्यधिक चीनी

  • कोल्ड ड्रिंक

  • पैकेज्ड स्नैक्स

  • अनियमित भोजन

  • देर रात खाना

  • कम पानी पीना

और क्या कम हो गया है?

  • ताजा भोजन

  • मौसमी फल

  • शुद्ध घी

  • घर का खाना

  • समय पर भोजन

  • पर्याप्त नींद

हम पेट भर रहे हैं, लेकिन कोशिकाओं को पोषण नहीं दे रहे।

शरीर को कैलोरी मिल रही है, लेकिन मन को स्थिरता देने वाले पोषक तत्व कम होते जा रहे हैं।

आखिर नशा इंसान को क्यों बदल देता है?

शायद कोई भी व्यक्ति नशा करने के लिए पैदा नहीं होता।

वह शुरुआत में केवल तनाव से थोड़ी राहत चाहता है।

कोई कहता है—

"बस एक सिगरेट से दिमाग शांत हो जाता है।"

कोई कहता है—

"थोड़ी शराब से टेंशन कम हो जाती है।"

कोई वेपिंग को फैशन समझता है।

कोई गुटखा या तंबाकू को आदत मान लेता है।

लेकिन धीरे-धीरे राहत की तलाश जरूरत बन जाती है।

और जरूरत, निर्भरता में बदलने लगती है।

फिर वही चीज जो कुछ समय के लिए राहत देती थी, धीरे-धीरे बेचैनी, चिड़चिड़ापन और आक्रामकता का कारण बनने लगती है।

कई बार व्यक्ति खुद नहीं समझ पाता कि उसके व्यवहार में बदलाव क्यों आ रहे हैं।

उसे लगता है कि पूरी दुनिया गलत है।

लेकिन अंदर ही अंदर उसका शरीर और मन लगातार मदद मांग रहे होते हैं।

डोपामिन की दुनिया में जी रही है आज की पीढ़ी

हमारे दिमाग में कुछ रसायन ऐसे होते हैं जो खुशी, उत्साह और प्रेरणा से जुड़े होते हैं।

उनमें से एक है डोपामिन।

समस्या डोपामिन नहीं है।

समस्या है लगातार और कृत्रिम उत्तेजना।

आज का युवा हर समय कुछ न कुछ नया चाहता है।

नई वीडियो।

नई रील।

नई नोटिफिकेशन।

नई चैट।

नई खरीदारी।

नई उत्तेजना।

दिमाग को आराम करने का मौका ही नहीं मिलता।

और जब दिमाग लगातार तेज गति से चल रहा हो, तो धीरे-धीरे सामान्य चीजें फीकी लगने लगती हैं।

किताबें उबाऊ लगती हैं।

परिवार के साथ बैठना बोरिंग लगने लगता है।

प्रकृति में शांति महसूस नहीं होती।

अकेले बैठना मुश्किल लगने लगता है।

और यहीं से बेचैनी का चक्र शुरू होता है।

क्या लगातार स्क्रॉलिंग हमारे भावनात्मक संतुलन को प्रभावित कर रही है?

कल्पना कीजिए—

आप सुबह उठे।

एक रील देखकर हँसे।

दूसरी देखकर दुखी हुए।

तीसरी देखकर डर गए।

चौथी देखकर गुस्सा आ गया।

पाँचवीं देखकर खुद को दूसरों से कम समझने लगे।

छठी देखकर उत्साहित हो गए।

यह सब केवल दस मिनट में हो गया।

हमारा मन इतना तेजी से भावनाएँ बदलने का आदी कभी नहीं था।

पहले इंसान प्रकृति के बीच रहता था।

आज वह स्क्रीन के बीच रह रहा है।

पहले पक्षियों की आवाज सुनता था।

आज नोटिफिकेशन की आवाज सुनता है।

पहले लोगों से मिलता था।

आज स्क्रीन से मिलता है।

और शायद इसी कारण अंदर की शांति धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है।

क्या GEN Z गलत है?

नहीं।

GEN Z गलत नहीं है।

बल्कि शायद सबसे ज्यादा भ्रमित पीढ़ी है।

उसके पास जानकारी बहुत है।

लेकिन दिशा कम है।

उसके पास विकल्प बहुत हैं।

लेकिन धैर्य कम होता जा रहा है।

वह सफलता जल्दी चाहता है।

पैसा जल्दी चाहता है।

शरीर जल्दी बनाना चाहता है।

रिश्ते जल्दी बनाना चाहता है।

और जब सब कुछ जल्दी चाहिए, तो निराशा भी जल्दी आने लगती है।

लेकिन इसमें केवल युवाओं की गलती नहीं है।

समाज ने उन्हें दिखाया है कि सफलता का मतलब केवल पैसा, फॉलोअर्स और दिखावा है।

किसी ने उन्हें नहीं बताया कि असली सफलता मानसिक शांति भी होती है।

सबसे खतरनाक बीमारी – अकेलापन

आज इंसान पहले से ज्यादा जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

लेकिन पहले से ज्यादा अकेला भी है।

एक ही घर में चार लोग बैठे हैं।

लेकिन चारों अपने-अपने मोबाइल में खोए हुए हैं।

बेटा इंस्टाग्राम में व्यस्त है।

पिता ऑफिस के तनाव में हैं।

माँ व्हाट्सएप में व्यस्त है।

और दादा-दादी चुपचाप बैठे हैं।

घर एक है।

लेकिन दुनिया अलग-अलग हो चुकी है।

यही अकेलापन धीरे-धीरे चिंता, अवसाद और गुस्से में बदल सकता है।

माता-पिता कहाँ गलती कर रहे हैं?

हर माता-पिता अपने बच्चों से प्यार करते हैं।

लेकिन कई बार प्यार की जगह सुविधाएँ दे दी जाती हैं।

बच्चा रोया—

मोबाइल दे दिया।

बच्चा चुप नहीं हुआ—

यूट्यूब लगा दिया।

बच्चा बाहर खेलने नहीं गया—

कोई बात नहीं, फोन है न।

धीरे-धीरे स्क्रीन उसकी दोस्त बन गई।

लेकिन स्क्रीन कभी माँ की गोद नहीं बन सकती।

न ही पिता के कंधे की जगह ले सकती है।

न ही दादा-दादी की कहानियों की।

बच्चों को महंगे फोन से ज्यादा समय चाहिए।

उन्हें खिलौनों से ज्यादा संवाद चाहिए।

उन्हें इंटरनेट से ज्यादा इंसान चाहिए।

और सबसे दुखद बात...

आज बहुत से युवा मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं।

लेकिन भीतर से टूटे हुए होते हैं।

वे स्टेटस लगाते हैं—

"सब बढ़िया है।"

लेकिन शायद कई रातों से ठीक से सो नहीं पाए होते।

वे मजाक करते हैं।

लेकिन अंदर से रो रहे होते हैं।

वे भीड़ में होते हैं।

लेकिन अकेले होते हैं।

और समाज अक्सर उनके दर्द को "नाटक" समझ लेता है।

याद रखिए—

हर हँसता हुआ चेहरा खुश हो, यह जरूरी नहीं।

हर शांत व्यक्ति मजबूत हो, यह जरूरी नहीं।

और हर गुस्सैल इंसान बुरा हो, यह भी जरूरी नहीं।

कई बार गुस्सा केवल उस दर्द की आवाज होता है, जिसे इंसान शब्दों में नहीं कह पाता।

आखिर समाधान कहाँ है?

समाधान मोबाइल तोड़ने में नहीं है।

समाधान नई पीढ़ी को दोष देने में नहीं है।

समाधान आधुनिकता से भागने में नहीं है।

समाधान संतुलन में है।

हमें फिर से इंसान बनना सीखना होगा।

हमें फिर से परिवार के साथ बैठना होगा।

हमें फिर से बच्चों की आँखों में देखना होगा।

हमें फिर से प्रकृति से जुड़ना होगा।

हमें फिर से धीमा होना सीखना होगा।

क्योंकि इंसान मशीन नहीं है।

उसे केवल इंटरनेट नहीं चाहिए।

उसे प्रेम चाहिए।

उसे अपनापन चाहिए।

उसे कोई ऐसा चाहिए जो उससे पूछे—

"बेटा, सच-सच बता... तू ठीक तो है ना?"

(क्रमशः… Part 3 में – आयुर्वेद इस पूरी समस्या को कैसे देखता है? पित्त दोष, रजोगुण, योग, प्राणायाम, सात्विक भोजन, दिनचर्या और युवाओं को बचाने के व्यावहारिक उपाय।)

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Frequently Asked Questions

तनाव, नींद की कमी, सोशल मीडिया, अकेलापन, नशे की आदतें और लगातार मानसिक दबाव व्यक्ति के व्यवहार और सहनशीलता को प्रभावित कर सकते हैं।
हाँ, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और लगातार बदलती डिजिटल सामग्री भावनात्मक अस्थिरता, चिड़चिड़ापन और ध्यान की कमी जैसी समस्याओं से जुड़ी हो सकती हैं।
संतुलित पोषण की कमी, अत्यधिक चीनी और प्रोसेस्ड फूड शरीर के साथ-साथ मानसिक ऊर्जा और मूड को भी प्रभावित कर सकते हैं।
लंबे समय तक नशे का सेवन तनाव, बेचैनी, मूड में बदलाव और भावनात्मक असंतुलन से जुड़ा हो सकता है।
लगातार दूसरों की सफलता, लाइफस्टाइल और उपलब्धियाँ देखने से कुछ लोगों में तुलना, असंतोष और मानसिक दबाव बढ़ सकता है।
आज की युवा पीढ़ी अत्यधिक जानकारी, प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया और अपेक्षाओं के बीच जी रही है, जिससे मानसिक दबाव पहले की तुलना में अलग प्रकार का हो सकता है।
हाँ, लंबे समय तक सामाजिक दूरी, भावनाओं को दबाकर रखना और संवाद की कमी व्यक्ति में चिड़चिड़ापन, तनाव और भावनात्मक असंतुलन को बढ़ा सकती है।
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Rishi K Sharma
Rishi K Sharma
Ayurved & Lifestyle Educator · 15+ Years Experience

Rishi K Sharma is a highly experienced Ayurved & Lifestyle Educator. He focuses on transforming your complete lifestyle through natural, practical Ayurvedic approaches that have helped 10,000+ patients achieve lasting wellness.